इस करम का करूँ शुक्र कैसे अदा

Is Karam Ka Karoon Shukr Kaise Ada, Jo Karam Mujh Pe Mere Nabi Kar Diya

इस करम का करूँ शुक्र कैसे अदा

इस करम का करूँ शुक्र कैसे अदा,
जो करम मुझ पे मेरे नबी कर दिया।

मैं सजाता हूँ सरकार की महफ़िलें,
मुझ को हर ग़म से रब ने बरी कर दिया।

इस करम का करूँ शुक्र कैसे अदा।

ज़िक्र-ए-सरकार की है बड़ी बरकतें

ज़िक्र-ए-सरकार की है बड़ी बरकतें,
मिल गई राहतें, अज़मतें, रिफ़अतें।

मैं गुनहगार था, बे-‘अमल था मगर,
मुस्तफ़ा ने मुझे जन्नती कर दिया।

इस करम का करूँ शुक्र कैसे अदा।

लम्हा-लम्हा है मुझ पर नबी की अता

लम्हा-लम्हा है मुझ पर नबी की अता,
दोस्तो! और माँगूँ मैं मौला से क्या?

क्या ये कम है कि मेरे ख़ुदा ने मुझे
अपने महबूब का उम्मती कर दिया।

इस करम का करूँ शुक्र कैसे अदा।

जो दर-ए-मुस्तफ़ा के गदा हो गए

जो दर-ए-मुस्तफ़ा के गदा हो गए,
देखते-देखते क्या से क्या हो गए।

ऐसी चश्म-ए-करम की है सरकार ने,
दोनों आलम में उन को ग़नी कर दिया।

इस करम का करूँ शुक्र कैसे अदा।

जो भी आए हैं महफ़िल में सरकार की

जो भी आए हैं महफ़िल में सरकार की,
हाज़री मिल गई उनको दरबार की।

कोई सिद्दीक़, फ़ारूक़, उस्माँ हुआ,
और किसी को नबी ने अली कर दिया।

इस करम का करूँ शुक्र कैसे अदा।

कोई मायूस लौटा न दरबार से

कोई मायूस लौटा न दरबार से,
जो भी माँगा, मिला मेरे सरकार से।

सदके जाऊँ, नियाज़ी! मैं लाजपाल के,
हर गदा को सख़ी ने सख़ी कर दिया।

इस करम का करूँ शुक्र कैसे अदा।